
बाह्य रु अंत:शत्रु की, तकलीफ जब आ जाय।
ज्ञान तब हरि के सामने, देखा करो सदाय।।...०१
मान अभिमान अहंकार, उनका आए वेग।
हरि को तब देखा करो, मिट जाए आवेग।।...०२
पंचविषय सुख चाह की, जब हो मन में पीर ।
ज्ञान हरि के सामने तब, देखा करो धर धीर।।...०३
बुरे घाट होने लगे, मन में जब भी ज्ञान।
तब विषय भोगना नहीं, पुकारना भगवान।।...०४
बेचेनी मन में आए, उदास जब हो ज्ञान।
तब भी हरि के सामने, देखते रहो निदान।।...०५
जब जब जीय गभराए, देखा करो हरि ज्ञान।
सब गभराहट मिटा सके , मात्र एक भगवान।।...०६
हरि की आज्ञा पकड के, स्थिर रहो तुम निदान।
वासना पीर से थक कर, धर्म न लोपो ज्ञान।।...०७
हरि बिना कोइ भी घाट, होने लगे जब ज्ञान।
तब हरि को देखने लगो, होकर ही सावधान।।...०८
तनासक्ति देहाभिमान, होने लगे जब ज्ञान।
आत्मा की ओर देखो, याद करो आत्मज्ञान।।...०९
हरि रास्ता निकालेंगे, विश्वास रखो ज्ञान।
विश्वासघात नहि करते, किसी का हि भगवान।।...१०
स्वनियंत्रण की पीडा या, पस्तावा की निदान।
प्रथम चुनो नहीं तो दूजी, सहनी पडेगी ज्ञान।।...११